अपाहिज

हो अपऩे अंभ मे मदमस्त मै देखती दुनिया को अपाहिज जो जानती अगंरेजी के चंद अक्षर हर हिंदी भाषी अपाहिज चंद खनकते सिक्के जेब मे मेरी गरीबी से मजबूर ना उम्मीद अाँखें अपाहिज है यदि कुशल शरीर मेरा तो समलैंगिक , कोढी और अपाहिज भी अपाहिज जगत मे अपने धर्म का ढिंढोरा पीटती दुसरे का … Continue reading अपाहिज

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वही खङे हैं

आज हम वहीं खङे हैं उन रास्तों पर। गली के उस मोङ पर तेरे आगन के सामने बालकनी से झांकती सङक पर जहाँ से न जाने कितनी दफा गुजरा तु फिर आ वही खङे हैं है पता न तेरा ठिकाना अब यहां तु कहीं अौर जा बसा फिर भी तेरी नामोजुदगी महसूस करने तेरे खामोशी … Continue reading वही खङे हैं

गुमनाम शहर

है गुमनाम कुछ यह शहर भी कहीं मीलों फैली हरियाली की चादर पे सङकीली लकीरें हैं खींच ङाली कही जर जर इमारतों से झांकती भविष्य की लाली पनघट है वही पुराना कुछ तराने शायद नए हैं मानों सूत सी खङी जुबान मे अँगरेजी रंगीन धागे बुने हो संवरता सुरज की लालिमा से नित दिन हर … Continue reading गुमनाम शहर

Demons

Its when night goes heavy And sky become dark The demons of loneliness arise Whispering the hidden fears of your heart Listen .. you listen closely But don't act on dem Coz u would repent In the morning that all